You are here
Home > Breaking न्यूज़ > हॉर्न बजाती गाड़ियों और बारातों में डीजे के शोर रोकेगा अशोका नाइस पल्युशन कंट्रोलर

हॉर्न बजाती गाड़ियों और बारातों में डीजे के शोर रोकेगा अशोका नाइस पल्युशन कंट्रोलर

theashoka news

वाराणसी। अशोक इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी एंड मैनेजमेंट के तीन स्टूडेंट्स ने मिलकर एक ऐसा उपकरण इजाद किया है जो साइलेंस जोन में सड़कों पर हॉर्न बजाती गाड़ियों और बारातों में डीजे के शोर का वाल्यूम स्वतः ही कम कर देगा। रात दस बजे के बाद ध्वनि प्रदूषण फैलाने वालों की सूचना भी इलाकाई थाना पुलिस को देगा। अशोक इंस्टीट्यूट ने इस उपकरण को नाम दिया है अशोका नाइस पल्युशन कंट्रोलर। इस उपकरण को और माडिफाई किया जा रहा है। कुछ दिनों बाद यह शोर मचाने वाले वाहनों की आवाज सहित वीडियो क्लिप पुलिस नियंत्रण कक्ष को भेजता रहेगा, जिसके आधार पर चालान और जुर्माने की कार्रवाई आसानी से की जा सकेगी।

अशोका नाइस पल्युशन कंट्रोलर को डिजाइन किया है अशोका इंस्टीट्यूट के स्टूडेंट्स आदित्य श्रीवस्तव, वैभव शुक्ला और प्रिंस कुमार ने। तीनों कंप्यूटर साइंस के तृतीय वर्ष के स्टूडेंट्स हैं। प्रोजेक्ट हेड श्याम चौरसिया के निर्देशन में लगातार बीस दिनों तक अथक प्रयास के बाद तीनों स्टूडेंट्स ने इस डिवाइस को तैयार किया है। वैभव, आदित्य और प्रिंस के मन में ध्वनि प्रदूषण नियंत्रित करने का विचार इसलिए आया कि आए दिन इनके घर के सामने से बारातें निकला करती थीं और उनकी पढ़ाई बाधित हो जाया करती थी। देवी जागरण के कार्यक्रमों के चलते कई बार स्टूडेंट्स परीक्षाओं की तैयारी ठीक से नहीं कर पाते हैं। अशोका नाइस पल्युशन कंट्रोलर वाहनों के हार्न अथवा डीजे को शोर स्वतः कम कर देगा। स्कूल और अस्पतालों के आसपास इस डिवाइस के लगने के बाद कोई चाहकर भी तेज आवाज वाला हार्न अथवा डीजे नहीं बजा सकेगा। अशोका नाइस पल्युशन कंट्रोलर हार्न बजाकर कानून तोड़ऩे वालों के बारे में पुलिस को अलर्ट भी करेगा।

अशोका नाइस पल्युशन कंट्रोलर उपकरण इजाद करने वाले स्टूडेंट्स के मुताबिक इसमें एक ऐसा सेंसर लगाया गया है जो साउंड को कंट्रोल करेगा। जिस स्थान पर हार्न न बजाने का बोर्ड लगा होगा उसी के पीछे इस उपकरण का सेंसर लगा दिया जाएगा। कोई भी वाहन अथवा डीजे वाला हार्न अथवा तेज स्पीकर बजाते हुए गुजरेगा तो इंफ्रारेड सिग्नल के जरिए उसकी आवाज को बंद देगा। वाहन अथवा डीजे जब तक सेंसर के रेंज में रहेगा तब तक उसकी आवाज बाधित रहेगी। रेंज के बाहर जाते ही वाहन अथवा डीजे की आवाज स्वतः वापस आ जाएगी। भविष्य में इस उपकरण को पुलिस अपने यहां लगाने के लिए अप्रूवल देती है तो उसे शोर मचाने वाले वाहनों का अलर्ट लगातार मिलता रहेगा। पुलिस चाहेगी तो वह कंट्रोल रूम से ही आवाज को इंटरनेट के जरिए नियंत्रित कर सकती है और एक्शन भी ले सकती है। यह उपकरण रात दस बजे के बाद और बेहतर ढंग से काम करता है।

अशोका इंस्टीट्यूट के प्रोजेक्ट हेड श्याम चौरसिया के मुताबिक अशोका नाइस पल्युशन कंट्रोलर बनाने में सिर्फ छह हजार रुपये खर्च आया है। पुलिस अगर सचमुच डीजे बजाने वालों पर शिकंजा कसना चाहती है तो उनके लिए स्पीकर में चिप स्टाल करने का नियम बना सकती है। यह चिप 70 से 100 रुपये में आएगी, जिसके लिए सिर्फ एक बार ही पैसे खर्च करने होंगे। डीजे मालिक अगर इस चिप को निकालेगा तो पुलिस तक सूचना स्वतः पहुंच जाएगी। श्री चौरसिया के मुताबिक इस डिवाइस का रेंज अभी 15 मीटर के आसपास है। इसमें वाईफाई लगने के बाद इसकी रेंज सौ मीटर तक बढ़ाई जा सकेगी। अगर इसे हम इंटरनेट से जोड़ देंगे तो कुछ जगहों से आने वाली आवाज के साथ उसकी वीडियो क्लिप भी इलाकाई थाना पुलिस के पास पहुंच जाएगी।

अशोका इंस्टीट्यूट के वाइस चेयरमैन अमित मौर्य ने कहा है की इंस्टीट्यूट अपने स्टूडेंट्स को ऐसे उपकरणों को इजाद करने के लिए लगातार प्रेरित करता है जिससे समाज में आने वाली मुश्किलों को दूर कर सकें। अशोका नाइस पल्युशन कंट्रोलर से हृदय रोगियों की जिंदगी आसान बनाई जा सकेगी। यह डिवाइस उन जंगलों में पशु-पक्षियों को राहत पहुंचाएगी जिसे सरकार ने अभ्यारण्य घोषित कर रखा है। इस उपकरण से ट्रैफिक कंट्रोल करने में सहूलियत होगी। भीड़-भाड़ वाले स्थान पर अशोका नाइस पल्युशन कंट्रोलर मील का पत्थर साबित हो सकता है। श्री मौर्य ने कहा कि शहरों में बहुत से लोग सुकून से रहने के लिए हर महीने अपनी सैलेरी का एक बड़ा हिस्सा ख़र्च करते हैं, लेकिन ध्वनि प्रदूषण के चलते उसी घर में वो रहना नहीं चाहते। ऑफ़िस से दस घंटे की शिफ़्ट पूरी करके जब वो घर पहुंचते हैं और सोने की कोशिश करते हैं तो वाहनों का तेज हार्न अथवा बारातों का डीजे उन्हें सोने नहीं देता। बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है सो अलग। ध्वनि प्रदूषण के इस तरह के तमाम मामले देश भर के सभी थानों में दर्ज हैं। आवासीय और साइलेंस जोन के लिए 55 डेसिबल दिन में और 45 डेसिबल रात में ध्वनि की अधिकतम सीमा है, लेकिन रुकता कौन है। ध्वनि प्रदूषण एक ऐसा मीठा जहर है, जिसे साबित करना अभी तक बहुत बड़ी चुनौती थी, लेकिन अशोका इंस्टीट्यूट के स्टूडेंट्स ने इसे आसान कर दिया है।

Leave a Reply

Top