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चित्र नहीं, भाव रचती हैं बनारस की अर्पण मौर्या

अर्पण के चित्रों में न सिर्फ रंगों की लयात्मकता और भावों की गहराई, बल्कि लय के साथ गायकी भी है

आदर्श, करुणा, त्याग, संघर्ष, साहस, मानवता, एकता, समरसता और राष्ट्रीयता को चित्रों की भाषा में पेश करने का सलीका बहुत कम लोगों को आता है। अनुभवी चित्रकार भी इन संवेगों को आसानी से नहीं पकड़ पाते। बनारस शहर, मगर दीनदयालपुर गांव की एक कलाकार अर्पण मौर्या ने अपनी कल्पनाशक्ति और प्रतिभा के जरिए अपने चित्रों में उस सार्थकता की तलाश की है जो समाज को ढेर सारी आस्था, सुली दृष्टि, गहरी संवेदना और आगे बढ़ने का साहस दे सके।

सुश्री अर्पण मौर्या औरतों के जीवन के किसी एक पक्ष को हंगामे की शक्ल में नहीं उतारना चाहतीं। वह गहराई से महसूस करने वाली आकृतियां बनाती हैं, जिसमें छिपी होती है पारंपरिक अमूर्त शिल्प की छाप। वह कहती हैं, “मैं कोई स्पेसिफिक थीम लेकर नहीं चलना चली। मुझे जो पसंद है वही कर रही हूं। चाहे वह अंदर से महसूस की गई अनुभव की चीज हो या फिर देखने के बाद प्रेरित होकर बनाई हुई। हमने अपने चित्रों में औरतों के दर्द से साथ गीत-संगीत के गहरे रिश्तों को उकेरने की कोशिश की है।”

अर्पण के चित्रों में न सिर्फ रंगों की लयात्मकता और भावों की गहराई है, बल्कि माहौल भी है। लय के साथ गायकी भी है। इन्होंने अपनी कृतियों में यह दर्शाने की कोशिश की है कि समाज के विखंडन से ही हिंसा और आतंक जन्म लेते हैं। अर्पण कहती हैं, “जब औरत टूटती है को समूचा समाज कई साल पीछे चला जाता है। मेरे मन में हमेशा से यह टीस और बेचैनी थी कि मुझे कुछ अलग करके, कुछ अलग बनकर दिखाना है।”

अर्पण मौर्या के चित्रों को देखेंगे तो पाएंगे कि उनमें समरसता है, सहजता है, रोचकता है और कुतूहल की प्रवृत्ति भी निहित है। वस्तु विन्यास यथार्थ और कल्पना का सहज समिश्रण है, जिसमें गजब का प्रवाह व गतिशीलता है। इनके चित्रों में श्रमशील लोग अन्याय, शोषण, घात से घिरे हैं, जिसमें गांव और शहर दोनों की हकीकत है। इस संवेदनशील चित्रकार की तूलिका औरतों की जुबान पेश करने में बेजोड़ है। इनकी चित्रों के भाव इतने मर्मस्पर्शी हैं कि उनमें हर कोई खो जाता है।

अर्पण कहती हैं, “मैं चित्र नहीं, भाव रचती हूं। अपने अंतस के भावों को रेखाओं का रूप देकर साकार करने की कोशिश करती हूं। हमने फाइन आट्स की पढ़ाई में पेंटिंग विषय को सिर्फ इसलिए चुना कि यह कला, सभी कलाओं में श्रेष्ठ है। चित्रकला धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्रदान करने वाली है। धार्मिक ग्रंथ विष्णु धर्मेत्तर पुराण में यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि जिस घर में चित्रकाल विद्यमान होती है, उस घर में साक्षात मांगल्य विद्यमान होता है।”

सुश्री अर्पण ने अपनी कला के जरिये गतिहीन याथास्थिति के वर्चस्व के विरुद्ध एक गहरी दृष्टि पेश की है। उनका मानना है, “कला वह है जो अनुभूति को व्यक्त कर सके। अनुभूति जीवन से मिलती है। कला जीवन की युगपथ साधना है। जीवन-जगत, जड़-चेतन, सभी में कलाकार को एक मानवीय संदेश सुनाई देता है।” यह दंभ नहीं सच्चाई है अर्पण ने औरतों के शोषण और असमानता के खिलाफ अपने चित्रों में संघर्ष को वाणी देकर नए पथ की खोज की है। यही वजह है कि उनके भाव प्रधान चित्रों में जो आकर्षण है वह लीक से हटकर है। चित्रों में आकृतियां मौलिकता का संदेश देती हैं।

अर्पण मौर्य के अधिकांश चित्रों में भाव जगत के अनुरूप एक खास तरह की दृढ़ता है जो नए कलाकारों की रचनाओं में नहीं दिखती। इनके चित्रों में चटक रंगों के बजाय शालीनता है। अर्पण के चित्रों को कहीं भी देखर सहज ही समझा और पहचाना जा सकता है। इन गुणों के आधार पर अर्पण को सिद्धहस्त चित्रकार माना जा सकता है। इनके अनुभवों का संसार व्यापक होता जा रहा है। इनके जीवन का मकसद धन अर्जन नहीं, बल्कि कला के उत्थान के लिए निरंतर काम करना चाहती हैं।

(अंजली यादव, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय-वाराणसी में पत्रकारिता की स्टूडेंट हैं)

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